सोमवार, 3 अगस्त 2009

अटल बिहारी वाजपेई भारतीय सूचना प्रौद्यौगिकी एवं प्रबंध संस्थान ग्वालियर

अटल बिहारी वाजपेई भारतीय सूचना प्रौद्यौगिकी एवं प्रबंध संस्थान ग्वालियर

(भारत सरकार का स्वशासी संस्थान)

v                 सुभाष चन्द्र अरोड़ा

 


v                 प्रस्तुतकर्ता संभागीय जनसंपर्क कार्यालय ग्वालियर में संयुक्त संचालक है ।

 

ई-गवर्नेंस साफ्टवेयर निर्माण हेतु पुरूस्कृत

ग्वालियर के अटल बिहारी वाजपेई प्रौद्यौगिकी संस्थान को ई गवर्नेंस की दृष्टि से उपयोगी '' फाईल ट्रेकिंग सिस्टम'' सॉफ्टवेयर निर्माण हेतु प्रदेश के सूचना प्रौद्यौगिकी मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय ने '' ई गवर्नेंस इनीशेटीव इन मध्य प्रदेश'' पुरूस्कार प्रदान किया। फाईल ट्रेकिंग सिस्टम के इस सॉफ्टवेयर का आई आई आई टी एम के डॉ. अनुराग श्रीवास्तव, डॉ. दिलीप कुमार एवं दो छात्रों विनीत रंजन एवं रोहित शुक्ला द्वारा निर्माण किया गया। यह द्विभाषीय सॉफ्टवेयर ओपन सोर्स तकनीक पर आधारित है। इस सॉफ्टवेयर की मदद से किसी भी विभाग अथवा संस्थान में आने व जाने वाली फाइलों का रिकार्ड आराम से रखा जा सकता है साथ ही समय समय पर फाइल की स्थिति की जानकारी भी ली जा सकती है।

 

 

अटलबिहारी वाजपेई भारतीय सूचना प्रौद्यौगिकी एवं प्रबंध संस्थान ग्वालियर भारत सरकार द्वारा स्थापित एक समविश्वविद्यालय है। यह सूचना प्रौद्यौगिकी तथा प्रबंधन दोनों क्षेत्रों में एक प्रतिष्ठित संस्थान है तथा विश्वस्तर का नामचीन संस्थान बनने के लिये प्रयासरत है।

       यह संस्थान 160 एकड़ के परिसर में निर्मित है तथा सक्षम शिक्षकों के साथ ही कलात्मक प्रयोगशालाओं से सुसज्जित है। इस संस्थान का परिसर सभी आवश्यक सुविधाओं से परिपूर्ण है, जहां छात्रों के व्यक्तित्व के सम्रग विकास के प्रयत्न किये जाते हैं। यहां की गतिविधियों का उद्देश्य छात्रों में जानकारी तथा शोध संस्कृति को बढ़ावा देना है।

       अ बि वा. भारतीय सूचना प्रौद्यौगिकी एवं प्रबंध संस्थान ग्वालियर का उद्देश्य देश में सूचना प्राद्यौगिकी तथा प्रबंधन की शिक्षा में बेंचमार्क स्तर की स्टेट ऑफ आर्ट सुविधायें प्रदान करना है। इस संस्थान का परिसर आधुनिक संचार सुविधाओं से सुसज्जित है। संस्थान, प्रबंधन एवं सूचना प्रौद्यौगिकी के क्षेत्र में सम्पूर्ण ज्ञान को प्रदान करने वाले वातावरण को तैयार करने वाले शिक्षा केन्द्र के रूप में स्थान प्राप्त कर चुका है।

       उद्योगों से संबंधित प्रबंधन के कार्यक्रम सलाहकार सेवा प्रदान करते हुए, संस्थान में समकालीन तथा संबंधित शोध क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी है। आई आई आई टी एम. की शोध सुविधाओं को प्रयोगशाला  परा संरचनाओं के द्वारा सशक्त बनाया गया है।

       शैक्षणिक पोषण के हित के लिये संस्थान में शोध पर विशेष बल दिया जा रहा है। प्रयोगशालाओं को सशक्त बनाकर छात्रों तथा शिक्षकों को शोध कार्यों में समाहित कर देश विदेश के विश्व विद्यालयों से सहयोग बढ़ाकर इन उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सका है। वर्तमान में संस्थान में निम्नलिखित प्रयोगशालायें संचालित हैं।

       आधारभूत इलेक्ट्रानिक प्रयोगशाला, डिजिटल प्रणाली प्रयोगशाला, संचार प्रणाली प्रयोगशाला, कम्प्यूटर नेटवर्किंग प्रयोगशाला, जेनेटिक कम्प्यूटिंग प्रयोगशाला (1,2,3), कम्यूनिकेशन स्किल प्रयोगशाला, वी एल एस आई. डिजाइन प्रयोगशाला, बिजनिस इनफोर्मेटिक्स प्रयोगशाला, ह्यूमनसेन्टर्ड कम्प्यूटिंग प्रयोगशाला, इन्फोर्मेशन सिक्योरिटी प्रयोगशाला, इंजीनियरिंग भौतिकी प्रयोगशाला तथा आई सी टी. कार्यशाला ।

       संस्थान के पुस्तकालय में प्रबंधन सूचना प्रौद्यौगिकी कम्प्यूटर विज्ञान, नेटवर्किंग, समाज विज्ञान के साथ साथ औद्यौगिक शोध पत्र तथा परियोजना प्रतिवेदनों सहित पाठय पुस्तकों व संदर्भ ग्रंथों का अच्छा संग्रह है।

       आई आई आई टी एम. ने सूचना स्रोतों की प्राप्ति का विस्तार डाटाबेस एक्सेस वर्चुअल पुस्तकालय के द्वारा किया है। यह पुस्तकालय इनडेस्ट कान्सोर्टियम का सदस्य है। पुस्तकालय द्वारा ई बी एस. को. के माध्यम से 800 से ज्यादा पत्रिकाओं को प्राप्त किया गया तथा सी. एम. आई. ई. द्वारा इकोनोमिक डाटाबेस उपलब्ध कराया गया है। संस्थान का पुस्तकालय सूचना प्रौद्यौगिकी तथा प्रबंधन के क्षेत्र की 200 से अधिक पत्र पत्रिकाओं को मंगाता है। इस पुस्तकालय में दर्शन शास्त्र योग आदि की पुस्तकें भी हैं। वर्तमान में छात्रों के लिये 14,500 पुस्तकें उपलब्ध हैं।

शैक्षणिक कार्यक्रम का रूपांकन इस अवधारणा से किया गया है, कि प्रबंधन, को सूचना प्रौद्यौगिकी के साधन के रूप में प्रभावशाली ढंग से संयुक्त किया जाये। पाठयक्रम का रूपांकन सूचना प्रौद्यौगिकी से संबंधित

आधुनिक विकास को ध्यान में रखकर किया गया है। इसमें साफ्टवेयर, नेटवर्किंग, मोबाइल, कंप्यूटिंग, व्ही एल एस आई. रूपांकन आदि के क्षेत्र सम्मिलित किये गये हैं। सूचना प्रौद्यौगिकी के अन्य क्षेत्रों जैसे- ई लर्निंग, ई गवर्नेंस, पर बल दिया गया है। सूचना प्रौद्योगिकी  की व्यवस्थित प्रबंधकीय श्रृंखला है। जिसमें स्ट्रैटजिक प्रबंधन तथा योजना कारकों का समावेश है संस्थान द्वारा एम टैक. , एम बी ए. तथा पी एच डी. कार्यक्रमों की ओर उन्मुख होने वाले स्नातकोत्तर पाठयक्रम संचालित है।

पंच वर्षीय इंटीग्रेटेड स्नातकोत्तर (आई पी जी.) कार्यक्रम - दस सेमेस्टर पूर्ण करने पर यह कार्यक्रम दोहरी डिग्री (स्नातक तथा स्नातकोत्तर) प्रदान करता है। कार्यक्रम का निर्माण इस प्रकार किया गया है जिससे छात्र छ: सेमेस्टर पूर्ण करने के पश्चात एम बी ए अथवा एम टैक. का चयन कर सकता है। छ: सेमेस्टर तक छात्राओं को विशेष और उसके विस्तार के लिये वृहद आयाम प्राप्त होता है। ताकि वे अपने आधार और दृष्टिकोण का विस्तार कर सकें। इसके लिये विज्ञान, मानविकी, प्रबंधन, कंप्यूटर एवं आई टी. विषयों को सम्मिलित किया गया है।

       अखिल भारतीय स्तर पर संचालित होने वाले ए आई आई ट्रिपल ई.अखिल भारतीय यांत्रिक प्रवेश परीक्षा के द्वारा कार्यक्रम में प्रवेश दिया जाता है।

एम टैक (आई टी.) कार्यक्रम (2वर्ष) - सूचना प्रौद्यौगिकी के उभरते हुए छात्रों के लिये तकनीकी रूप से सक्षम वृत्तिकों को तैयार करने के उद्देश्य से एम टैक कार्यक्रम का तकनीकी विकास किया गया है। इस कार्यक्रम का रूपांकन सूचना प्रौद्यौगिकी की अवधारणा के विभिन्न  खण्डों में आवकों के लिये किया गया है। छात्रों का चयन व्यक्तिगत साक्षात्कार तथा जी ए टी ई. में अर्जित  अंकों के आधार पर किया जाता है। एम टैक स्तर पर विशेषज्ञता चार क्षेत्रों में प्रस्तावित है। ये चार क्षेत्र क्रमश: सूचना प्रौद्यौगिकी, उन्नत नेटवर्क, साफ्टवेयर इंजीनियरिंग तथा व्ही एल एस आई. है।

एम बी ए. कार्यक्रम (2 वर्ष )- एम बी ए पाठयक्रम को सूचना प्रौद्यौगिकी के महत्व को रेखांकित करते हुए इस तरह से रूपांकित किया है कि संबंधित सूचना तथा इसके प्रसारण में प्रबंधकीय परिस्थितियों में त्वरित गति में निर्णय लेने योग्य छात्रों को बनाया जा सके। इस कार्यक्रम को प्रबंधन की अवधारणा तथा सूचना प्रौद्यौगिकी दोनों को मिश्रित कर तैयार किया गया है। जी डी. के पश्चात व्यक्तिगत साक्षात्कार तथा कैट के आधार पर संस्थान में छात्र एवं छात्राओं का चयन किया जाता है।

शोध कार्यक्रम (पी एच डी.)- जुलाई 2001 में डाक्टरेट कार्यक्रम प्रारंभ किया गया । संस्थान में संचालित प्रवेश परीक्षा तथा साक्षात्कार के माध्यम से छात्रों का चयन शोध कार्यक्रम के लिये किया जाता है। सूचना प्रौद्यौगिकी तथा प्रबंधन पर बल देते हुए समस्त क्षेत्रों में डाकटोरल कार्यक्रम उपलब्ध कराया गया है। इनमें निम्न लिखित अर्न्तभागी शोध क्षेत्रों को शामिल किया गया। मोबाइल कंप्यूटिंग (संचार प्रणालियों डबल्यू ए पी. वायर लेस नेटवर्किंग आदि) नेटवर्किंग तथा सूचना सुरक्षा (वितरित नेटवर्क, सेन्सर नेटवर्क सूचना सुरक्षा किप्टोग्राफी आदि)

       सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, (एस डब्ल्यू आर्किटेक्चर, अलगोरिथमस - ग्राफ प्रोब्लम ) डाटा स्ट्रक्चर प्रोग्रामिंग लेंग्वेज आपरेटिंग प्रणाली गुणवत्ता प्रबंधन आदि, एम्बेडेड प्रणाली, (वीएलएसआई)डिजाइन डिजीटल सिस्टम डिजाइन, एन ई एम एस. आदि, ह्यूमन सेन्टर्ड कंप्यूटिंग ,एन.एल.पी.ए.एल, एच.सी.एल.  इमेज प्रोसेसिंग स्पीच टैक्नोलॉजी कंप्यूटर विजन एण्ड रोबोटिक्स सीमेन्टिक वेब डब्ल्यू 3 सी. स्टेण्डर्डस लोकेलाइजेशन आदि, ज्ञान प्रबंधन (इन्फार्मेशन इंटीग्रेशन) डीडीएस, एससीएम, ईआरपी, पीएलएम, पीडीएम, आईपीआर तथा गुणवत्ता, प्रबंधन टैक्नोलॉजी बिजनिस इम्क्यूबेशन आदि व्यापार विश्लेषण (डाटा वेयर हाउसिंग माइनिंग,व्यावसायिक बौध्दिकता डाटा, विजुअलाइजेशन जोखिम प्रबंधन आदि) नैनो विज्ञान तथा प्रौद्यौगिकी (मटेरियल मॉडलिंग, नैनो सेन्सर्स, नैनो डिवाइसेज)।

       संस्थान उद्योगों से शोध एवं विकास तथा मानवशक्ति के बेहतर उपयोग के लिये लम्बे  समय तक संबंध कायम करने के प्रयास करता है। सीईओ व्याख्यान ग्रीष्म इन्टर्नशिप तथा परिसर भर्ती आदि के द्वारा उद्योगों के संपर्क में रहते हैं। परिसर के अंदर तथा उसके बाहर दोनों प्रकार से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये गये हैं। 2008 बैच के 90 प्रतिशत छात्रों को रोजगार प्राप्त हो चुका है।  शेष छात्रों को रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास जारी हैं। 2009 के बैच के रोजगार खोजने के अन्वेशन कार्य भी प्रारंभ हो चुके हैं।

इति।

 

 

सोमवार, 27 जुलाई 2009

लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय ग्‍वालियर

लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय ग्‍वालियर  

 

v                जयंत सिंह तोमर

 

 


v                  लेखक - लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय,ग्वालियर में व्याख्याता है ।

 

 

'बुंदेले हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झाँसी वाली रानी थी ।'

       प्रसिध्द कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता की ये पंक्तियां सभी के मन में सन् 1857 की अमर बलिदानी वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का ओजपूर्ण चित्र खींचती है। ग्वालियर में अंग्रेज फौज से लड़ते हुये देश की स्वतंत्रता की खातिर झांसी की रानी ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिये । सौ वर्ष बाद जब स्वाधीन भारत ने प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शताब्दी वर्ष मनाया तो यह तय किया गया कि ग्वालियर में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की स्मृति में एक शारीरिक शिक्षा महाविद्यालय स्थापित किया जायेगा ।

      ग्वालियर नगर के प्रथम महापौर पहाड़गढ़ के राजा पंचमसिंह की इस संस्था की स्थापना में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही । वे स्वयं एक अच्छे निशानेबाज थे । रियासत के दौर में जहां घुड़दौड़ व पोलो का मैदान था, वहीं इस संस्था की शुरूआत हुई । भारत के श्रेष्ठ शारीरिक शिक्षाविद् प्रो. पी एम जोसेफ इस संस्था के पहले प्रिंसिपल नियुक्त किये गये । शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में केवल पी.एम.जोसेफ ही हैं, जिन्हें पद्मश्री अलंकरण से नवाजा गया। इस संस्थान का प्रारंभ विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से सम्बध्द महाविद्यालय के रूप में हुआ । ग्वालियर में जीवाजी विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद सन् 1964 में यह उसके अन्तर्गत आ गया । राष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रखते हुये सन् 1973 में इसका नामकरण लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा महाविद्यालय (एलएनसीपीई) किया गया । सन् 1982 में ' स्वायत्तशासी ' संस्था का दर्जा  हासिल करने के बाद सितम्बर 1995 में इसे सम विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 14 जनवरी 2009 को इसे पूर्ण विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया ।

      लक्ष्मीबाई रष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय में इस समय सात विभाग संचालित हैं। टीचर एज्यूकेशन विभाग में चार वर्षीय बैचलर आफ फिजीकल एज्यूकेशन (बीपीई) व दो वर्षीय पाठयक्रम मास्टर आफ फिजीकल एज्यूकेशन (एमपीई) संचालित है । रिसर्च डेवलपमेंट एंड एंडवांस्ड् स्ट्डीज डिपार्टमेंट में एम-फिल व पीएचडी की उपाधि प्रदान की जाती है । खेल प्रबंधन व खेल पत्रकारिता विभाग अपेक्षाकृत नया विभाग है । समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन व वेब माध्यमों में खेल पत्रकारिता के विस्तृत होते क्षेत्र को ध्यान में रखते हुये प्रशिक्षित खेल पत्रकार तैयार करने के लिये यहां खेल पत्रकारिता में एक वर्षीय पीजी डिप्लोमा पाठयक्रम चलाया जा रहा है । ऐसा ही एक पाठयक्रम खेल प्रबंधन के क्षेत्र में भी संचालित है।

      प्रशिक्षण एवं दक्षता विभाग (कोचिंग एंव फिटनेस) क्रीड़ा प्रशिक्षण में पीजी डिप्लोमा व सर्टिफिकेट कोर्स संचालित करता है । युवा कार्यक्रम एवं खेल विभाग साहसिक खेल एवं पर्यटन प्रबंधन में  (एकवर्षीय) स्नातकोत्तर पत्रोपाधि प्रदान करता है ।  स्वास्थ्य विज्ञान एवं योग विभाग, वैकल्पिक चिकित्सा, योग व फिटनेस मैनेजमेंट आदि विषयों में विभिन्न पाठयक्रम संचालित करता है । कम्प्यूटर विज्ञान एवं अनुप्रायोगिक सांख्यिकी विभाग, सूचना प्रौद्योगिकी  व सांख्यिकी के पाठयक्रम संचालित करता है ।

      वर्तमान में कुलपति मेजर जनरल एस.एन मुखर्जी के कार्यकाल में इस राष्ट्रीय महत्व की संस्था की छवि में बहुत निखार आया है । उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि है इस संस्थान का डीम्ड यूनीवर्सिटी से पूर्ण विश्वविद्यालय में तब्दील होना । इन्हीं के कार्यकाल में प्रथम प्रचार्य पीएम जोसेफ की स्मृति में एक खूबसूरत केन्द्रीय ग्रंथालय भी स्थापित हुआ है । शारीक्षिक शिक्षा व खेलकूद से संबंधित यह देश का एक मात्र ग्रंथालय है जिसे कम्प्यूटरीकृत कर अत्याधुनिक स्वरूप दिया जा रहा है ।

      एलएनयूपीई में सेना द्वारा प्रायोजित खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिये विशेष पाठयक्रम आयोजित किये जाते हैं । बकौल मेजर जनरल एस एन मुखर्जीं एलएनयूपीई लंबे समय तक एशिया की सर्वश्रेष्ठ संस्थाओं में शुमार होती रही है । अब हम इसे विश्वस्तर की श्रेष्ठ संस्था बनाने के लिये युध्दस्तर पर प्रयासरत हैं । विस्तार देने के लिये हाल में गुवाहाटी व देहरादून में एलएनयूपीई के दो केन्द्र भी स्थापित किये गये हैं ।

      ' ोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानव में निरोगी काया को पहला सुख बताया है । कहा भी जाता है कि ' तंदुरूस्ती हजार नियामत' इसी आदर्श को धारण किये हुये एलएनयूपीई अब ' फिट पीपुल- फिट नेशन ' का मूलमंत्र देश के जनसाधारण के बीच ले जाने के लिये प्रयासरत है ।

 

एलएनयूपीई के सितारे

       लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय यों तो मूलरूप से खेल व शारीरिक शिक्षा के प्रशिक्षक तैयार करने का केन्द्र है, इसके बावजूद स्थापना के 52 वर्षों में यहां के कई शिक्षक व विद्यार्थियों ने खेल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां, पुरस्कारों के रूप में हासिल की हैं । इनमें से कुछ महत्वपूर्ण नाम इस प्रकार हैं:-

नाम                 अवार्ड          क्षेत्र

1-डा.पी एम जोसफ      पद्मश्री          शारीरिक शिक्षण

2- डा. अजमेर सिंह      अर्जुन अवार्ड     ट्रैक एंड फील्ड

3- प्रो. करन सिंह       द्रोणाचार्य अवार्ड  ट्रैक एंड फील्ड

4- कल्पना देवनाथ      अर्जुन अवार्ड     जिम्नास्टिक

5- ब्रिगेडियर लाभ सिंह   अर्जुन अवार्ड     ट्रैक एंड फील्ड

6- विजय सिंह चौहान    अर्जुन अवार्ड     डेलाथेलान

 

 

शुक्रवार, 8 मई 2009

जैविक खेती : उत्तम पैदावार व खेतों को उपजाऊ रखने की सफल विधि

जैविक खेती : उत्तम पैदावार व खेतों को उपजाऊ रखने की सफल विधि

Article Presented By: Zonal Public Relation Office, Gwalior Chambal Zone

जैविक खेती जीवों के सहयोग से की जाने वाली खेती के तरीके को कहते हैं। प्रकृति ने स्वयं संचालन के लिये जीवों का विकास किया है जो प्रकृति को पुन: ऊर्जा प्रदान करने वाली जैव संयंत्र भी हैं । यही जैविक व्यवस्था खेतों में कार्य करती है । खेतों में रसायन डालने से ये जैविक व्यवस्था नष्ट होने को है तथा भूमि और जल-प्रदूषण बढ़ रहा है । खेतों में हमे हमारे पास उपलब्ध जैविक साधनों की मदद से खाद, कीटनाशक दवाई, चूहा नियंत्रण हेतु दवा बगैरह बनाकर उनका उपयोग करना होगा । इन तरीकों के उपयोग से हमें पैदावार भी अधिक मिलेगी एवं अनाज, फल सब्जियां भी विषमुक्त एवं उत्तम होंगी । प्रकृति की सूक्ष्म जीवाणुओं एवं जीवों का तंत्र पुन: हमारी खेती में सहयोगी कार्य कर सकेगा ।

फसल पोषण को समझने के लिये हमें निम्न तथ्यों पर विचार करना होगा ।  प्रकृति ने हवा में में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन क्यों दी है ? . सभी पौधों की पत्तियां हरी क्यों हैं ?  पौधे अपनी आवश्यकता की नाइट्रोजन हवा से क्यों नही ले सकते ?  सूक्ष्म जीवाणु मिट्टी में क्या कार्य पूर्ण करते हैं ?  प्रकृति का जंगली पेड़ों को पोषण देने का क्या तरीका है ?  खरपतवार बिना उर्वरकों के कैसे बढ़ते हैं ? एक ही जमीन अलग-अलग फसलों की आवश्यकता, जो कि अलग-अलग है को कैसे पूरा करती है ।

       ध्यान देने योग्य बात है कि पौधा अंकुरण से लेकर पूरी उम्र तक एक ही स्थान पर खड़ा रहता है । यह भोजन के लिये दूसरे स्थान पर नहीं जा सकता । इस बात को प्रकृति ने ध्यान में रखते हुये उनके पोषण के लिये एक व्यवस्था बनाई है ।

       पौधों की अच्छी वृध्दि हेतु इतनी अधिक नाइट्रोजन प्रकृति ने हवा में दी है, परंतु पौधे इसे सीधे शोषित नहीं कर सकते । यदि वे ऐसा करते तो उनकी लम्बाई इतनी अधिक हो जाती कि दूसरी प्राणियों को रहने में परेशानी खड़ी हो सकती थी। अत: नाइट्रोजन पौधों के लिये सूक्ष्म जीवाणुओं के माध्यम से उपलब्ध होती है, जो वायु नाइट्रोजन को परिवर्तित कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं ।

       मिट्टी में कई तरह के सूक्ष्म जीवाणु मौजूद हैं । उसका कार्य पौधों को मिट्टी में उपलब्ध सूक्ष्म तत्व उपलब्ध कराना है  * उदाहरणार्थ- कुक वेक्टीरिया फास्फोरस को घोलकर पौधों को उपलबध कराते हैं । राइजोबियम, एजेक्टोबेक्टर नाइट्रोजन उपलब्ध कराते हैं । सल्फर घोलक-थायोबेसिलस पोटाश घोलक, लोह तत्व घोलक, खुडीप्लस आदि जीवाणु वो तत्व पौधों को उपलब्ध कराते हैं । ये सूक्ष्म जीवाणु परिवर्तन की उस प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं ।

       पौधों का हरा रंग प्रकाश संश्लेषण द्वारा सूर्य की ऊर्जा की मदद से पौधों की ग्रोथ के लिये कार्बोहाइड्रेड का निर्माण करता है । पत्तियों का लाल रंग जेन्थोफिल के कारण होता है उसका कार्य भी यही है ।

       पोषक तत्वों का एन.पी.के. सिध्दान्त प्रकृति में संपूर्ण रूप में सही नही है । जंगलों में पौधों को किसी भी रूप में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश नहीं दिया जाता, फिर उन्हें यह पोषक तत्व कैसे मिल जाते हैं । इसका उत्तर जो पत्तियां पेड पौधों से झड़ती हैं, वे बैक्टीरिया के द्वार क्रिया के पश्चात या तो सीधे पौधों को उपलब्ध हो जाते हैं या भूमि में उपलब्ध तत्वों के पोषक तत्वों में बदलने में सहयोग करते हैं । यह कार्य सिर्फ जीवित मिट्टी में ही संभव है ।

       मनुष्य की गतिविधियों से दूर रसायन की बाहर से आपूर्ति के बिना ये पेड़ पौधे सूर्य, हवा, बारिश, आकाशीय बिजली, नमी व वैक्टीरिया से अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर लेते हैं ।

       खरपतवार का मामला भी वनों जैसा ही है । ना तो कोई इनका बीज होता है और ना ही इन्हें कोई खाद देता है । स्पष्ट है कि प्रकृति ने इनके पैदा हाने की एक व्यवस्था निर्मित की है । उसी व्यवस्था से इनका पालन-पोषण होता है । साथ ही कई प्रकार के खरपतवार नाइट्रोजन अन्य खरपतवारों को उपलब्ध कराते हैं । कई उनमें प्राप्त रसायनों से पडौसी खरपतवारों को रोगों एवं कीड़ों से सुरक्षा करते हैं । परस्पर अपनी विशेषताओं से ये एक दूसरे को सहयोग कर एवं प्रकृति की सूक्ष्म व्यवस्थाओं के सहयोग से अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं । इन सूक्ष्म जीवाणुओं एवं वनस्पति को सूर्य शक्ति का उपयोग कर ऊर्जा निर्मित करने की क्षमता है । जिससे ये अपना जीवन चक्र संचालित करते हैं ।

       उन्नीसवीं सदी में बैरम व्हॉन इरसेन ने प्रयोगों के बाद सिध्द किया कि जीवित प्राणियों में जो है, इससे जो चाहिये, वो बनाने की क्षमता है । बीज में जो खनिज हैं, वे अंकुरण के साथ बदल जाते हैं, पौधे मैग्नीज को केल्सियम में, केल्सिमय को फास्फोरस में, फास्फोरस को सल्फर में बदलने में समक्ष पाये गये हैं । जमीन से पौधा नहीं बदलता, पौधे से जमीन बदलती है ।

       अत: इससे ज्ञात होता है कि जीवाणु और जीव जो प्रकृति के जैव संयंत्र हैं, प्रकृति ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बनाये हैं । प्रकृति अपने आप में पूर्ण है। इसे बाहर से कोई मदद नही चाहिये । खेती में भी यही जीवाणु कार्य करते हैं । जीवाणु ही कचरे को सड़ाते-पड़ाते हैं । उन्हीं से तैयार खादों से पेड़ -पौधे पोषक तत्व को प्राप्त करते हैं ।